मेराज नूरी
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बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले में पुलिस भी अब शक के घेरे में है। साथ ही राजनीतिक पार्टियां और सरकार के शीर्ष अधिकारी भी शक के दायरे में दिखने लगे हैं। पुलिस की जांच को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। खासकर तब जब सीबीआई ने इसकी जांच शुरू कर दी है।--------------
दरअसल मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार कांड, सरकारी तंत्र की कार्यशैली को बेपर्दा कर चुका है। यानी हर मौके पर अपने और तथाकथित सुशासन का दम्भ भरनेवाले नीतीश कुमार के बिहार में बेझिझक यह कहा जा सकता है कि शासन तंत्र अपनी खामियों को पकड़ने और उसे दुरुस्त करने की इच्छाशक्ति खो चुका है। भारतीय संविधान में प्रदत शक्तियों के तहत शासन तंत्र में क्षमता तो है ,लेकिन राजनीतिक चक्रव्यूह में जकड़े और घृनत मानसिकता के जाल में फंसे इस तंत्र की इच्छाशक्ति मर चुकी है।
जिसका नतीजा है कि अब इस मामले में संरक्षण का खेल खेला जा रहा है।पर्दापोशी की कोशिशें की जा रही हैं।हर वो हतखंडा अपनाया जा रहा है और चाल चली जा रही है जिसके बल पर मामले की इतिश्री की जा सके और दोषियों को बचाया जा सके।ताज़ा घटनाक्रम इस बात की पुष्टि करने को काफी हैं।मुजफ्फरपुर के आइजी और डीआइजी मामले उजागर होने के दो माह बाद बालिका गृह का निरीक्षण करने पहुंचे और एसएफएल की टीम बुलाकर जांच करवाई। कुछ आपत्तिजनक दवाएं और इंजेक्शन भी बरामद किए गए। अधिकारियों ने यहां की व्यवसथा देख नाराजगी जताई और इसे यातना गृह बताया। ये सब उस दिन हुआ जब मामला तूल पकड़ चुका था।मीडिया में हेडलाइन्स बन चुकी थीं।राजनीतिक दल के लोग मुज़फ़्फ़रपुर का रुख कर चुके थे।नीतीश कुमार चारों तरफ से सवालों के घेरे में आ चुक थे।यानी मज़बूरी के आलम में दिए गए सी बी आई जाँच के आदेश और सी बी आई के द्वारा केस टेकओवर करने के एक दिन पहले।
अब सवाल तो लाज़मी है कि घटना के खुलासे के बाद पुलिस अधिकारी आखिर अचानक तब कैसे जागे जब सीबीआई ने एक दिन बाद ही जांच का जिम्मा संभाल लिया। आखिर क्या रहा होगा इसका मकसद? जबकि एक जून को ही मामले की प्राथमिकी मुजफ्फरपुर महिला थाने में दर्ज की गई थी। दो जून को कागजात ज़ब्त कर भवन सील कर दिया गया। सवाल उठता है कि आखिर सीबीआई टेक ओवर के मात्र एक दिन पहले बालिका गृह पहुंचकर एसएफएल टीम से जांच कराने के पीछे कहीं सबूतों से छेड़छाड़ की पुलिसिया कवायद तो नहीं है? इसका मकसद क्या यह नहीं कि सीबीआई को कुछ सबूत न मिल पाएं? दवाएं और इंजेक्शन पुलिस अधिकारियों ने इतने दिन बाद क्यों जब्त किए? क्या कुछ और रहस्यमय वस्तुओं के गायब करने की कवायद का यह हिस्सा तो नहीं?
यक़ीनन ये बड़ा और विचारणीय सवाल है।ये सवाल इस लिए भी अहम है क्योंकि अतीत में भी ऐसा ही खेल खेला गया था जिसका परिणाम लोगों ने देखा है।वो मामला तब बिहार के बहुचर्चित सृजन घोटाले का था।उस मामले में भी पुलिस और मिलीभगत तंत्र ने ऐसा ही खेल खेला था।उस मामले में अपने हतखंडे अपना कर और शातिरगिरी के सहारे पुलिस ने जब सारे सबूत को अपने कब्जे में ले लिया था तभी मामला सीबीआई के पास जाने दिया गया।
दूसरी ओर अगर मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनाचार मामले के उजागर होने के पहले के घटनाक्रम को देख जाए तो भी स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी तंत्र इसमें पूरी तरह लिप्त है और उसी के संरक्षण में ये घृणित खेल खेला गया।एक उदाहरण ही काफी है इस बात को समझने के लिए।वो ये की बालिका गृह में रहनेवाली बालिकाओं की देख रेख के लिए सलाहकार परिषद का गठन किया गया।साल 2012 में गठित इस परिषद के अध्यक्ष डीएम थे।सदस्य के रूप में डॉक्टर और शिक्षा पदाधिकारी भी शामिल थे लेकिन कभी किसी को इस बालिका गृह में यातना की दिल दहलाने वाली तस्वीर नहीं दिखी और ना किसी ने कभी कोई ऐसी रिपोर्ट दी जिससे ये बातें सामने आतीं। 2017 में बिहार किशोर न्याय के अंतर्गत बालिकाओं की देखरेख के लिए जिला निरीक्षण समिति का गठन किया गया।इस समिति में भी डीएम को ही अध्यक्ष रखा गया।इस समिति में एक पुलिस के अधिकारी को जोड़ा गया ।यहां तक कि मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी को भी सदस्य बनाया गया ।इस समिति में एक महिला को भी रखा गया।एक डीएसपी रैंक के अधिकारी को रखा गया।बावज़ूद इसके बालगृह में नाबालिग बच्चियों के साथ यौनाचार होता रहा।सवाल उठता है कि आखिर क्या ये समिति सिर्फ कागज़ी कार्रवाई के लिए थी, सरकारी आदेश सिर्फ खानापूर्ति के लिए था? या फ़िर ये फाइल का एक हिस्सा भर रहा गया।सरकारी आदेश रद्दी का कागज़ बन गया और अधिकारियों ने अपना काम कर हाथ पर हाथ रख बैठ गए।
दूसरी तरफ राजनीतिक दल भी इस बहुचर्चित मामले में संदेहों की रडार पर दिखाई दे रहे हैं। कल्याण विभाग के अधिकारी तो पहले ही आरोपों के घेरे में आ चुके हैं। समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा पर यहां आने के आरोप लग चुके हैं।ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि इस हमाम में कौन कौन नंगा है।लेकिन ये तभी मुमकिन है जब तंत्र दबाव से परे सी बी आई जांच में सहयोग करे।अगर बिहार के तथाकथित सुशासन के सिपहसालारों नें अपने आक़ाओं की नामक हलाली की तो फिर शायद सी बी आई जांच भी महज़ खानापूर्ति ही होगी जैसा कि कई मामलों में होता आया है।अगर निष्पक्ष जांच और न्याय हुआ तो यकीनन इसमें कई बेनक़ाब होंगे और बालिकाओं पर यातनाओं का पूर्ण कच्चा चिट्ठा खुलेगा ।






